Friday, 24 April 2015

बगलामुखी जयंती
बगलामुखी जयंती और रवि-पुष्य योग का अद्भुत संयोग २६ अप्रैल को |
भगवान शिव द्वारा प्रकट की गई दस महाविद्याओं में प्रमुख आठवीं महाविद्या माँ 'बगला' मुखी का प्राकट्य पर्व वैशाख शुक्ल अष्टमी 26 अप्रैल रविवार को
मनाया जाएगा | इसदिन दोपहरबाद 03 बजकर 53 मिनट तक पुष्य नक्षत्र भी है अतः सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला बलवान रवि-पुष्य योग भी निर्मित
हो रहा है ! इस योग में माँ की आराधना तथा दान-पुण्य, जप-तप का फल अमोघ रहेगा | जो लोग अनेकों समस्याओं, कष्टों एवं संघर्षों से लड़कर हताश हों
चुके हों, या जिनके जीवन में निराशा ने डेरा डाल रखा है उन लोगों को सफलता देने के लिए माँ बगलामुखी प्रतिक्षण तत्पर रहती हैं ये अपने भक्तों के अशुभ
समय का निवारण कर नई चेतना का संचार करती है | इनमे संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं | आदिकाल से ही इनकी साधना शत्रुनाश, वाकसिद्धि,
कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय, मारण, मोहन, स्तम्भन और उच्चाटन जैसे कार्यों के लिए की जाती रही है | इनकी कृपा से साधक का जीवन हर प्रकार
की बाधाओं से मुक्त हो जाता है |माँ रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजती हैं और रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं इनकी सर्वाधिक आराधना
रानीतिज्ञ चुनाव जीतने और अपने शत्रुओं को परास्त करने में अनुष्टान स्वरूप करवाते हैं । इनके प्रकट होने की कथा है कि एकबार पूर्वकाल में महाविनाशक्
तूफ़ान से सृष्टि नष्ट होने लगी चारों ओर हाहाकार मच गया | प्राणियों की रक्षा करना असंभव हो गया यह महाविनाशक तूफान सब कुछ नष्ट करता हुआ आगे
बढ़ता जा रहा था, जिसे देखकर पालनकर्ता विष्णु चिंतित हो शिव को स्मरण करने लगे, शिव ने कहा कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक
नहीं सकता अतः आप शक्ति का ध्यान करें, विष्णु जी ने 'महात्रिपुरसुंदरी' को ध्यान द्वारा प्रसन्न किया | देवी विष्णु जी की साधना से प्रसन्न हो सौराष्ट्र क्षेत्र की
हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती हुई प्रकट हुई, और अपनी शक्ति के द्वारा उस महाविनाशक् तूफ़ान को स्तंभित कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया तब सृष्टि
का विनाश रुका ! माँ का 36 अक्षरों वाला यह मंत्र 'ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धि विनाशय ह्लीं ॐ  स्वाहा' |
शत्रुओं का सर्वनाश कर अपने साधक को विजयश्री दिलाकर चिंता मुक्त कर देता है ! मंत्र का जप करते समय पवित्रता का विशेष ध्यान रखें, मंत्र पीले वस्त्र
पीले आसन और हल्दी की माला का ही प्रयोग करें जप करने से पहले बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करें |पं. जय गोविन्द शास्त्री

Friday, 17 April 2015

अक्षुण फलदाई स्वयंसिद्ध मुहूर्त 'अक्षय तृतीया' 21अप्रैल को
'न क्षयः इति अक्षयः' अर्थात - जिसका क्षय नहीं होता वह अक्षय है | सभी वैदिक ग्रंथों ने बैसाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया को 'अक्षय' तृतीया माना है |
मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार तिथियों का घटना-बढ़ना, क्षय होना, चान्द्रमास एवं सौरमास के अनुसार निश्चित रहता है, किन्तु 'अक्षय' तृतीया का कभी भी क्षय
नहीं होता ! श्रीश्वेत वाराहकल्प के वैवस्वत मन्वन्तर में सत्ययुग के आरम्भ की इस अक्षुण फलदाई तिथि को मानव कल्याण हेतु माता पार्वती ने बनाया था |
वे कहती हैं कि जो स्त्री/पुरुष सब प्रकार का सुख चाहतें हैं उन्हें 'अक्षय' तृतीया का व्रत करना चाहिए | इस तृतीया के व्रत के दिन नमक नहीं खाना चाहिए,
व्रत की महत्ता बताते हुए माँ पार्वती कहती हैं, कि यही व्रत करके मैं प्रत्येक जन्म में भगवान् शिव के साथ आनंदित  रहती हूँ ! उत्तम पति की प्राप्ति के
लिए भी हर कुँवारी कन्या को यह व्रत करना चाहिए ! जिनको संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो वे भी यह व्रत करके संतान सुख ले सकती हैं | देवी इंद्राणी ने
यही व्रत करके 'जयंत' नामक पुत्र प्राप्त किया था | देवी अरुंधती यही व्रत करके अपने पति महर्षि वशिष्ट के साथ आकाश में सबसे ऊपर का स्थान प्राप्त
कर सकीं थीं ! प्रजापति दक्ष की पुत्री रोहिणी ने यही व्रत करके अपने पति चन्द्र की सबसे प्रिय रहीं ! उन्होंने बिना नमक खाए यह व्रत किया था ! प्राणी को
इस दिन झूट बोलने और पाप कर्म करने से दूर  रहना चाहिए | जो प्राणी किसी भी तरह का यज्ञ, जप-तप, दान-पुण्य करता है उसके द्वारा किये गये सत्कर्म
का फल अक्षुण रहेगा | भूमिपूजन, व्यापार आरम्भ, गृहप्रवेश, वैवाहिक कार्य, यज्ञोपवीत संस्कार, नए अनुबंध, नामकरण आदि जैसे सभी मांगलिक कार्यों के लिए
अक्षय तृतीया वरदान की तरह है | इसदिन रोहिणी नक्षत्र का आरम्भ दोपहर 11 बजकर 57 मिनट पर हो रहा है उससमय अभिजित मुहूर्त भी रहेगा | इसलिए
रोहिणी नक्षत्र के संयोग से दिन और भी शुभ रहेगा | प्राणियों को इसदिन भगवान विष्णु की लक्ष्मी सहित गंध, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धुप, दीप नैवैद्य आदि से
पूजा करनी चाहिए ! अगर भगवान् विष्णु को गंगा जल और अक्षत से स्नान करावै, तो मनुष्य राजसूय यज्ञ के फल कि प्राप्ति होती है | शास्त्रों में इसदिन
वृक्षारोपण का भी अमोघ फल बताया गया है जिसप्रकार अक्षय तृतीया को लगाये गये वृक्ष हरे-भरे होकर पल्लवितपुष्पित होते हैं उसी प्रकार इसदिन वृक्षारोपण
करने वाला प्राणी भी कामयाबियों के चरम पर पहुंचता है ! पं जयगोविंद शास्त्री

Wednesday, 15 April 2015

हर इंसान के शरीर की अपनी एक गंध होती है | ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार यही अलग-अलग गंध अलग-अलग व्यक्तियों के व्यवहार
और भाग्य की सूचक भी होती है|

Sunday, 12 April 2015

'देवताओं का अभिजित मुहूर्त आरम्भ, सूर्यदेव की मेष संक्रान्ति 14 अप्रैल को
संवत्सर की बारह संक्रातियों में प्रमुख मेष संक्रांति 14 अप्रैल को दोपहर 01 बजकर 45 मिनट से आरम्भ हों जायेगी | इसी के साथ ही मांगलिक कार्यों के
लिए अशुभ माना जाने वाला खरमास समाप्त हो जाएगा | सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ ही देवताओं का 'चक्रसुदर्शन मुहूर्त' आरम्भ हों जाएगा यही
दक्षिणायन सूर्य का मध्य भी होता है | ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस राशि के आने पर सूर्य अपनी सर्वोच्च शक्तिओं से संपन्न रहते हैं अतः इस अवधि
के मध्य जन्म लेने वाले जातक अपनी कामयाबियों के बीच आरहे कष्टों-संघर्षों को परास्त करके लक्ष्य तक पहुचते हैं और अपनी अलग पहचान बनाने में
सफल रहते हैं | यह संक्राति मंगलवार को मंगल के ही नक्षत्र धनिष्ठा और शुभ योग में पड़ रहा है, इसलिए सूर्य और मंगल का यह योग और भी प्रभावकारी
सिद्ध होगा | इस अवधि में किया जाने वाला दान-पुण्य, जप-तप, पूजा-पाठ का फल अक्षुण रहता है | भगवान कृष्ण ने एक हजार वर्ष तपस्या करके सूर्य से 'सूर्यचक्र'
वरदान स्वरुप प्राप्त किया था ! भगवान राम नित्य-प्रति सूर्य की उपासना करते थे | महर्षि अगस्त ने उन्हें सूर्य का प्रभावी मंत्र आदित्य ह्रदयस्तोत्र की दीक्षा
दी थी | ब्रह्मा जी इन्हीं के सहयोग से श्रृष्टि का सृजन करते हैं | शिव का त्रिशूल, नारायण का चक्रसुदर्शन और इंद्र का बज्र भी सूर्य के तेज से ही बना |
अर्घ्य देने मात्र से ही सूर्य प्रसन्न हों जाते हैं ! इनके उदय होते ही प्रतिदिन इंद्र पूजा करते हैं, दोपहर के समय यमराज, अस्त के समय वरुण और अर्धरात्रि में
चन्द्रमा पूजन करते हैं | विष्णु, शिव, रूद्र, ब्रह्मा, अग्नि, वायु, ईशान आदि सभी देवगण रात्रि कि समाप्ति पर ब्रह्मवेला में कल्याण के लिए सदा सूर्य की ही
आराधना करते हैं | इसीलिए इन सभी देवों में सूर्य का ही तेज व्याप्त है, इन्हें गुड़हल अथवा मंदार पुष्प की माला सर्वाधिक प्रिय है ! इसके अतिरिक्त
कनेर, बकुल, मल्लिका, के पुष्प ताबे के पात्र में जल के साथ सूर्यार्घ्य देने से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं ! मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, बृश्चिक, धनु
एवं कुंभ राशि वालों के लिए सूर्य की मेष संक्रांति मान-सम्मान पद प्रतिष्ठा की वृद्धि कराएगी ! नए कार्य और अनुबंध के योग बनेगें ! बृषभ, कन्या, तुला,
मकर और मीन राशि वालों के लिए मिश्रित फल कारक ही रहेगी ! पं जयगोविंद शास्त्री

Wednesday, 8 April 2015

बृहस्पति हुए मार्गी 08अप्रैल
बृहस्पति चार महीने बाद 8अप्रैल की रात्रि 10बजकर 23मिनट पर मार्गी हो रहे हैं, ये 8दिसंबर 2014 को वक्री हुए थे | बृहस्पति का वक्री-मार्गी होना ज्योतिष जिज्ञासुओं
के लिए बड़ीघटना के रूप में माना जाता है, क्योंकि जातकों की जन्मकुंडलियों में इनकी शुभ स्थिति जीवात्मा को आत्मबोध की ज्योति प्रदान करती है मार्गी रहने पर गुरु
प्राणियों की बुद्धि को सुचारू रूप से सही दिशा में चलाते है किन्तु वक्री होने पर मन-मस्तिस्क में भय-भ्रम और विषाद पैदा कर देतें हैं | वेदों में इनके महत्व को दर्शाते हुए
कहा गया है कि 'बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिष: परमे व्योम | सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत्तमांसि ||
अर्थात - बृहस्पति आकाश के उच्चतम स्तर पर स्थित होकर सभी दिशाओं से, सप्त रश्मियों से, अपनी ध्वनि से, हमें आच्छादन करने वाले अन्धकार को पूर्ण तया दूर
करते हैं ये सुंदर, पीतवर्ण, बृहद शरीर, भूरेकेश वाले अपने याचकों और आराधकों को वांछित फल प्रदान करने वाले देवता है | शादी-विवाह, संतान सुख, मांगलिक कार्यों,
आद्ध्यात्मिक एवं शिक्षा सम्बन्धी कार्यों में इनका विशेष योगदान रहता है | कुंडली में ये अकारक हों या वक्री अथवा किसी भी तरह से दोषयुक्त हों तो दोष शान्ति कराना
उत्तम रहता है | ज्योतिष शास्त्र में इन्हें साधु-संतों, आध्यात्मिक गुरुओं, तीर्थ स्थानों, मंदिरों, पवित्र नदियों तथा पवित्र पानी के जल स्तोत्रों, धार्मिक साहित्य तथा पीपलवृक्ष
का कारक माना गया है | इसके अतिरिक्त इन्हें अध्यापकों, ज्योतिषियों, दार्शनिकों, वित्तिय संस्थानों में कार्य करने वाले व्यक्तियों, लेखकों, कलाकारों तथा बैंकिंग सेवा का
भी कारक माना जाता है | ये धनु और मीन राशियों में स्वामी हैं अपनी उच्च राशि कर्क में स्थित होकर सर्वाधिक बली हो जाते हैं और मकर राशि में इन्हें नीच राशिगत
होने की संज्ञा प्राप्त है बृहस्पति दूसरे, पाचवें, नवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते हैं ये शिक्षा, संतान तथा स्त्री की कुंडली में पति के भी कारक माने गए हैं | बली गुरू
के प्रभाव वाले जातक दयालु, दूसरों का ध्यान रखनेवाले, धार्मिक तथा मानवीय मूल्यों कोसमझने वाले बुद्धिमान होते हैं ये कठिन हालात में भी विषयों को भी आसानी से
समझ लेने की क्षमता रखते हैं | ऐसे जातक अच्छे तथा सृजनात्मक कार्य करने वाले होते हैं तथा इस कारण समाज में इनका एक विशेष आदर होता है | स्टॉक मार्केट एवं
कमोडिटी के सेक्टर्स के निवेशकों के लिए मार्गी होना और भी उत्तम रहेगा विशेष करके बैंक निफ्टी, बीमा, आई टी, शैक्षणिक संस्थानों, गैस, फार्मा और आभूषणों के सेक्टर्स
के निवेशकों के लिए शुभ संकेत हैं ! कर्क, तुला, बृश्चिक और मीन राशियों के लिए उत्तम, मेष, बृषभ, मिथुन, कन्या तथा मकर राशियों के लिए मध्यम फलदाई रहेंगें |
सिंह, धनु और कुंभ राशि वालों के मिला-जुला प्रभाव् ही रहेगा ! बृहस्पति की कृपा पाने के लिए प्रतिदिन स्नान के बाद ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः मंत्र का जप 11 बार
करना श्रेयष्कर रहेगा | पं जयगोविंद शास्त्री

     

Thursday, 26 March 2015

शक्तितत्व की पूजा का दिन 'दुर्गाष्टमी'
महादैत्य महिसासुर का वध करने के लिए देवताओं के तेज से प्रकट होने वाली माँ दुर्गा अपने हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दंड, शक्ति,
खड्ग, ढाल, शंख, घंटा, मधुपात्र, शूल, पाश, और चक्र धारण करती है ! नवरात्र के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, दैत्यों का संहार करते
समय माँ ने कहा, 'एकै वाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा' ! अर्थात- इस संसार में एक मै ही हूँ दूसरी और कोई शक्ति नहीं ! सभी चराचर जगत जड़-चेतन, दृश्य-अदृश्य
रूपों में मै ही हूँ ! मैं सृष्टि सृजन के समय भवानी, युद्ध क्षेत्र में दुर्गा, क्रोध के समय काली और जीवात्माओं की रक्षा एवं उनके पालन के समय विष्णु बन जाती हूँ ! सभी
नारियों में स्त्रीतत्व रूप में मैं ही हूँ ! इसलिए नारी का सम्मान करना मेरी पूजा करने जैसा है ! माँ पृथ्वी पर कन्याओं के रूप में विचरण करती हैं ! जिनमे दो वर्ष की कन्या
को कुमारी, तीन वर्ष की कन्या को अ+उ+म त्रिदेव-त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की कालिका, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शाम्भवी,
नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा के समान मानी जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष से लेकर नौ वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती है ।
दुर्गा सप्तशती में कहागया है कि 'कुमारीं पूजयित्या तू ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्' अर्थात- दुर्गापूजन से पहले कुवांरी कन्याका पूजन करने के पश्च्यात ही माँ दुर्गा का पूजन करें ! भक्तिभाव से की गई एक कन्या की पूजा से ऐश्वर्य, दो कन्या की पूजा से भोग, तीन की चारों पुरुषार्थ, और राज्यसम्मान,पांच की पूजा से -बुद्धि-विद्या, छ: की पूजा से
कार्यसिद्धि, सात की पूजा से परमपद, आठ की पूजा अष्टलक्ष्मी और नौ कन्या की पूजा से सभी एश्वर्य की प्राप्ति होती है। पुराण के अनुसार इनके ध्यान और मंत्र इसप्रकार हैं !
मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम् । नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्। जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरुपिणि । पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोस्तु ते।।
कुमार्य्यै नम:, त्रिमूर्त्यै नम:, कल्याण्यै नमं:, रोहिण्यै नम:, कालिकायै नम:, चण्डिकायै नम:, शाम्भव्यै नम:, दुगायै नम:, सुभद्रायै नम: !!
इन दुर्गारुपी कन्याओं का पूजन करते समय पहले उनके पैर धुलें पुनः पंचोपचार बिधि से पूजन करें और तत्पश्च्यात सुमधुर भोजन कराएं और प्रदक्षिणा करते हुए यथा शक्ति
वस्त्र, फल और दक्षिणा देकर विदा करें ! इस तरह महाष्टमी/नवमी के दिन कन्याओं का पूजन करके भक्त माँ दुर्गा की कृपा पा सकते हैं ! पं जयगोविन्द शास्त्री

Wednesday, 25 March 2015

नूतन संवत् 'कीलक' में राजा शनि और मंत्री मंगल
कीलक नामक बयालीसवां विक्रमी संवत् 2072 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का आरम्भ आज दोपहर 3बजकर 05 मिनट पर उत्तराभाद्रपद नक्षत्र एवं शुक्ल योग
में हो रहा है उस समय क्षितिज पर कर्क लग्न का उदय हों रहा होगा, परन्तु सम्वत्सर का संकल्पमान सूर्योदय कालीन तिथि 21मार्च से मान्य होगा !
इसीदिन से चैत्र नवरात्र प्रतिपदा का आरम्भ भी हो जायेगा ! शास्त्रों के अनुसार इसी तिथि को सत्ययुग का आरम्भ भी हुआ था, इसलिए इसदिन को
स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है ! इसदिन दिनभर के किये गये जप-तप, पूजा-पाठ, दान-पुण्य का फल अक्षुण रहता है ! सभी मांगलिक कार्यों, श्राद्ध, तर्पण,
पिंडदान आदि का संकल्प करते समय वर्ष पर्यन्त ''कीलक'' नामक संवत् का उच्चारण किया जायेगा ! संवत् में वर्षा की स्वामिनी रोहिणी का वास समुद्र
में रहेगा जिसके फलस्वरूप वर्षा अधिक होगी धान्यादि की पैदावार प्रचुर मात्रा में रहेगी ! संवत् का वाहन महिष तथा वास माली के घर रहेगा ! जिसका
फल मिलाजुला किन्तु सकारात्मक रहेगा ! वर्ष के दशाधिकारियों में बृहस्पति एवं चन्द्र को तीन-तीन, शनि के पास दो और मंगल तथा बुध को एक-एक
अधिकार मिला हुआ है जो जनमानस के लिए शुभ संकेत है !  वर्ष पर्यन्त पूर्ण प्रशासन शनि और मंगल के पास रहेगा इसलिए अनुशासन की दृष्टि से
ये साल जाना जाएगा ! शनिदेव मृत्युलोक के न्यायदाता है इसलिए इसवर्ष अन्य वर्षों की अपेक्षा न्यायिक प्रणाली अधिक विश्वसनीय रहेगी ! कर्क लग्न
की संवत् की कुंडली में केन्द्र और त्रिकोण में कुल सात ग्रह हैं जो देश का सकल घरेलु उत्पाद मजबूती के साथ तो बढ़ेगा ही साथ महँगाई दर में भी
गिरावट आएगी, परन्तु प्राकृतिक आपदाओं जैसे आँधी-तूफ़ान, महामारी का वर्चस्व कायम रहेगा ! शनि और मंगल के प्रभाव से विश्वभर में भारत की
संप्रभुता, एकता, अखंडता का संकल्प बरकार रखने में सरकार को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा ! इन्हीं योगों के फलस्वरूप जेल में कुमार्गियों, भ्रष्ट
नेताओं और अफसरों की संख्या बढ़ेगी ! संवत् के मध्य 17 जून से 16 जुलाई तक मलमास/पुरुषोत्तम रहेगाजिसमें भगवान विष्णु की पूजा आराधना
सहस्त्रनाम, पुरुषसूक्त आदि का पाठ करना उत्तम रहेगा लेकिन शादी-विवाह, मुंडन, गृहप्रवेश यज्ञोपवीत आदि कार्य वर्जित रहेंगें ! पं जयगोविन्द शास्त्री