Monday, 25 May 2015

गंगा दसहरा का क्या महत्व- पं जयगोविंद शास्त्री
आदिकाल में ब्रह्मा जी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से निवेदन किया कि हे पराशक्ति ! आप सम्पूर्ण लोकों का आदि कारण बनों, मैं तुमसे ही संसार की
सृष्टि आरम्भ करूँगा | ब्रह्मा जी के निवेदन पर मूलप्रकृति- गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी, ब्रह्मविद्या उमा, शक्तिबीजा, तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात
रूपों में अभिव्यक्त हुईं | इनमें सातवीं 'पराप्रकृति 'धर्मद्रवा' को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित देखकर ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमण्डलु में धारण कर लिया,
वामन अवतार में बलि के यज्ञ के समय जब भगवान श्रीविष्णु का एक चरण आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुआ तब
ब्रह्मा ने कमण्डलु के जल से श्रीविष्णु के चरणों की पूजा की | पाँव धुलते समय उस चरण का जल हेमकूट पर्वत पर गिरा, वहाँ से भगवान शंकर के
पास पहुँचकर वह जल गंगा के रूप मे उनकी जटा में स्थित हो गया सातवीं प्रकृति गंगा बहुतकाल तक भगवान शंकर की जटा में ही भ्रमण करती
रहीं, तत्पश्च्यात सूर्यवंशी राजा दिलीप के पुत्र भागीरथ ने अपने पूर्वज राजा सागर की दूसरी पत्नी सुमति के साठ हज़ार पुत्रों का विष्णु के अंशावतार
कपिल मुनि के श्राप से उद्धार करने के लिए शंकर की घोर आराधना की | तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर ने गंगा को पृथ्वी पर उतारा | इसप्रकार
'ज्येष्ठ मासे सिते पक्षे दशमी बुध हस्तयोः | व्यतिपाते गरा नन्दे कन्या चन्द्रे बृषे रवौ | हरते दश पापानि तस्माद् दसहरा स्मृता || अर्थात- ज्येष्ठ
मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि बुधवार, हस्त नक्षत्र में दस प्रकार के पापों का नाश करने वाली गंगा का पृथ्वी पर आगमन हुआ | उस समय गंगा
तीन धाराओं में प्रकट होकर तीनों लोकों में गयीं और संसार में त्रिसोता के नाम से विख्यात हुईं | गंगा ध्यान एवं स्नान से प्राणी दस प्रकार के दोषों-
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल-कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्त हो जाता है, यही नही अवैध संबंध, अकारण जीवों को कष्ट
पहुंचाने, असत्य बोलने व धोखा देने से जो पाप लगता है, वह पाप भी गंगा 'दसहरा' के दिन गंगा स्नान से धुल जाता है | स्नान करते समय माँ
गंगा का इस मंत्र 'विष्णु पादार्घ्य सम्पूते गंगे त्रिपथगामिनी ! धर्मद्रवीति विख्याते पापं मे हर जाह्नवी | द्वारा ध्यान करना चाहिए और डुबकी लगाते
समय श्रीहरि द्वारा बताए गये इस सर्व पापहारी मंत्र- ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः | जप करते रहने से तत्क्षण लाभ मिलता है |

Thursday, 14 May 2015

शनैश्चर जयंती १७ मई को
मृत्युलोक के दंडाधिकारी शनिदेव का जन्मोत्सव पर्व प्रत्येक वर्ष में ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है | पौराणिक कथाओं के अनुसार इनका जन्म
सूर्यदेव की दूसरी पत्नी छाया से हुआ, शनिदेव जब माँ के गर्भ में थे तब माँ छाया भगवान शिव की घोर तपस्या में लीन थी उन्हें अपने खान-पान तक की सुध
नहीं थी | छाया के तप के प्रभाव से गर्भस्थ शिशु शनि भी जन्म लेने के पश्च्यात पूर्णतः शिवभक्ति में लीन रहने लगे एकदिन उन्होंने सूर्यदेव से कहा कि पिता
श्री हर बिभाग में आपसे सात गुना ज्यादा होना चाहता हूँ, यहाँतक कि आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना अधिक हो, मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति
प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये, चाहे वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो | आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे,
मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों और मैं भक्ति-ज्ञान से पूर्ण हो जाऊं | पुत्र शनि के उच्च विचारों से प्रसन्न हो सूर्यदेव ने कहा वत्स !
तुम अविमुक्त क्षेत्र काशी चले जाओ और वहीँ शिव की तपस्या करो तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगें ! पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर शनिदेव काशी गये और
शिवलिंग बनाकर अखण्ड शिव आराधना करने लगे | तपस्या से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उन्हें ग्रहों में सर्वोपरि स्थान तो दिया ही साथ ही मृत्युलोक
का न्यायाधीश भी नियुक्त किया तथा न्यायिक प्रक्रिया का कठोरता से पालन करने के लिए इनके नाम की शाढेसाती और ढैया का वरदान भी दिया दिया
इसमें शाढेसाती की अवधि सत्ताईस सौ दिन और ढैया की अवधि नौ सौ दिन घोषित की | तबसे लेकर आजतक शनिदेव की ढैया और साढ़ेसाती का डर लोंगों
में व्याप्त है जिसका जीवन में शुभाशुभ प्रभाव व्यक्ति के आचरण और कर्म के अनुसार पड़ता है पिता सूर्य ने इन्हें मकर और कुंभ राशि के साथ-साथ अनुराधा,
पुष्य एवं उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का अधिपति बनाया | शनिदेव ने जिस शिवलिंग की स्थापना की थी आज वही नवें ज्योतिर्लिंग 'श्रीकाशीविश्वनाथ' के नाम से जाने
जाते हैं ! भगवान शनि को प्रसन्न करने के लिए प्राणियों को शनि स्तोत्र, शनिकवच, शनि के वैदिक मंत्र का पाठ करना चाहिए अपने बड़ों के प्रति सम्मान रखना
चाहिए अहिंसा, उदारता, दयालुता, दया और सेवाभाव रखना ही शनिदेव की कृपा पाने के सरल उपाय हैं ! इनके जन्मदिन पर वस्त्र और अन्नदान का विशेष महत्व
रहता है इसदिन शमी अथवा पीपल के वृक्ष का रोपण करने नौ ग्रहों से सम्बंधित सभी कष्ट दूर हो जाते हैं | पं जयगोविन्द शास्त्री

Friday, 8 May 2015

अपरा एकादशी व्रत' अधमाधम पापों से मुक्ति
पौराणिक मान्यताओं कें आधार पर सनातम धर्म में एकादशी तिथि के व्रत-पूजन का सर्वाधिक महत्व बताया गया है, 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भी परमेश्वर श्रीकृष्ण
ने इस तिथि को अपने समान बलशाली बताया है | एक वर्ष में चौबीस एकादशी होती हैं, किन्तु जब पुरुषोत्तम मास लगता है तो इनकी संख्या छब्बीस हो
जाती है !सभी एकादशियों में अपने ही नाम के अनुसार पुण्यफल देने का सामर्थ्य है | वर्तमान ज्येष्ठ कृष्णपक्ष की एकादशी को 'अपरा' या 'अचला' एकादाशी
के नाम से जाना जाता है पद्मपुराण के 'उत्तरखण्ड' में इस व्रत का विस्तार से वर्णन मिलता है | इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्महत्या, गौहत्या, गोत्रहत्या,
भ्रूण करने से, माप-तोल में धोखा देने से, भू‍त-प्रेतयोनि, परनिंदा का पाप, परस्त्री गमन, झूठी गवाही देना, झूठ बोलना, चोरी जैसे पाप शीघ्र समाप्त हों जाते हैं !
धर्मराज युधिष्टिर को समझाते हुए भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए वे नरकगामी होते हैं, परंतु 'अपरा' एकादशी का व्रत करने से वे
भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं | जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे अवश्य नरक में पड़ते हैं, किन्तु 'अपरा' एकादशी का व्रत करने से
वे भी इस पाप से मुक्त हो जाते हैं, हे | धर्मराज, जो फल तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने से या गंगा तटपर पितरों को पिंडदान करने से प्राप्त
होता है, वही 'अपरा' एकादशी का व्रत करने से प्राप्त होता है। मकर राशि में सूर्य की यात्रा में प्रयाग तीर्थ के स्नान से, महाशिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि
के बृहस्पति में गोदावरी नदी के स्नान से, केदारनाथ के दर्शन तथा बद्रीनाथ के दर्शन करने से, सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र के स्नान और स्वर्णदान करने से, गौदान से
जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से मिलता है | यह व्रत पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए अग्नि,
पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है | अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना
चाहिए। इस तिथि पूर्णतः व्रत रखकर को षोडशोपचार बिधि से भगवान वामन की पूजा करनी चाहिए पश्च्यात अगले दिन ब्राह्मण एवं भूखे लोगों को भोजन
कराकर व्रत की पारणा करने से प्राणी भौतिक सुखों को भोगता हुआ मरणोपरांत गोलोकवासी होता है | पं जयगोविन्द शास्त्री

Monday, 4 May 2015

अमावस्या का क्या महत्व..?
अमावस्या अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धारुपी नैवेद्य अर्पित करने की महत्वपूर्ण तिथि है | श्रीश्वेतवाराहकल्प में इसतिथि का निर्धारण पूर्णरूप से, पितृ श्राप
से मुक्ति, अशुभ कर्मों के प्रायश्चित, उग्रकर्म जैसे मारण, मोहन, उच्चाटन एवं स्तम्भन आदि के लिए किया गया है | इस तिथि को सूर्य-चन्द्रमा एक ही
राशि में आ जाते हैंजिसके फलस्वरूप चंद्र क्षीण एवं अदृश्य रहते है | मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार किसी भी मांगलिक कार्य के लिए सूर्य, चंद्र और बृहस्पति का
स्वस्थ तथा शुभ प्रभावी रहना अति आवश्यक माना गया है | चूँकि अमावस्या को चंद्र का उदय नहीं होता, इसीलिए इसतिथि को शुभकार्यों के लिए वर्ज्य
माना गया है | श्राद्ध-तर्पण के लिए अति पुण्यदायी इस तिथि के विषय में एक पौराणिक कथा है कि, देवताओं के पितृगण, जो पितृलोक में सोमपथ और
अग्निष्वात नाम से जाने जाते हैं उनकी मानसी कन्या अच्छोदा ने एक बार देवताओं के एक हज़ार वर्षतक घोर तपस्या की | उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर
देवताओं के समान अतिसुंदर पितृगण पुष्प मालाओं तथा सुगन्धित पदार्थों से सुसज्जित होकर अच्छोदा को वरदान देने के लिए प्रकट हुए, ये सभी पितृगण
युवा अमिततेजस्वी, परम बलशाली और कामदेव के समान सुंदर थे | इनमें  अमावसु नाम के एक सुंदर पितर को देख कर अच्छोदा अतिशय कामातुर होकर
प्रणय निवेदन की याचना करने लगीं किन्तु अमावसु ने अच्छोदा की याचना पर अनिच्छा प्रकट कर कहा कि मेरी हाड़-मांस से निर्मित इस नश्वर शरीर में
कोई रुचि नहीं हैं आप मुझे क्षमा करें | अमावसु के इस वैराज्ञपूर्ण जवाब से अच्छोदा लज्जित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं | तभी आकाश से देवता और पितर
गण अमावसु के अनुपम धैर्य की सराहना करने लगे और सर्वसम्मति से उस तिथि को अमावसु के नाम पर रख दिया जिसे हम अमावस्या के नाम से जानते
हैं | अमावसु का धर्म अक्षुण रहा और यह तिथि पितृगणों को अति प्रिय हुई | सभी देवतावों और पितृगणों ने वरदान दिया कि, जो भी प्राणी इस तिथि को
अपने पितरों को श्राद्ध-तर्पण करेगा वह सभी पापों एवं श्रापों से मुक्त हो जाएगा | उसके घर परिवार में सबप्रक्रार की सुख शांति रहेगी | पं जयगोविन्द शास्त्री

Friday, 24 April 2015

बगलामुखी जयंती
बगलामुखी जयंती और रवि-पुष्य योग का अद्भुत संयोग २६ अप्रैल को |
भगवान शिव द्वारा प्रकट की गई दस महाविद्याओं में प्रमुख आठवीं महाविद्या माँ 'बगला' मुखी का प्राकट्य पर्व वैशाख शुक्ल अष्टमी 26 अप्रैल रविवार को
मनाया जाएगा | इसदिन दोपहरबाद 03 बजकर 53 मिनट तक पुष्य नक्षत्र भी है अतः सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला बलवान रवि-पुष्य योग भी निर्मित
हो रहा है ! इस योग में माँ की आराधना तथा दान-पुण्य, जप-तप का फल अमोघ रहेगा | जो लोग अनेकों समस्याओं, कष्टों एवं संघर्षों से लड़कर हताश हों
चुके हों, या जिनके जीवन में निराशा ने डेरा डाल रखा है उन लोगों को सफलता देने के लिए माँ बगलामुखी प्रतिक्षण तत्पर रहती हैं ये अपने भक्तों के अशुभ
समय का निवारण कर नई चेतना का संचार करती है | इनमे संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं | आदिकाल से ही इनकी साधना शत्रुनाश, वाकसिद्धि,
कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय, मारण, मोहन, स्तम्भन और उच्चाटन जैसे कार्यों के लिए की जाती रही है | इनकी कृपा से साधक का जीवन हर प्रकार
की बाधाओं से मुक्त हो जाता है |माँ रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजती हैं और रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं इनकी सर्वाधिक आराधना
रानीतिज्ञ चुनाव जीतने और अपने शत्रुओं को परास्त करने में अनुष्टान स्वरूप करवाते हैं । इनके प्रकट होने की कथा है कि एकबार पूर्वकाल में महाविनाशक्
तूफ़ान से सृष्टि नष्ट होने लगी चारों ओर हाहाकार मच गया | प्राणियों की रक्षा करना असंभव हो गया यह महाविनाशक तूफान सब कुछ नष्ट करता हुआ आगे
बढ़ता जा रहा था, जिसे देखकर पालनकर्ता विष्णु चिंतित हो शिव को स्मरण करने लगे, शिव ने कहा कि शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक
नहीं सकता अतः आप शक्ति का ध्यान करें, विष्णु जी ने 'महात्रिपुरसुंदरी' को ध्यान द्वारा प्रसन्न किया | देवी विष्णु जी की साधना से प्रसन्न हो सौराष्ट्र क्षेत्र की
हरिद्रा झील में जलक्रीडा करती हुई प्रकट हुई, और अपनी शक्ति के द्वारा उस महाविनाशक् तूफ़ान को स्तंभित कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया तब सृष्टि
का विनाश रुका ! माँ का 36 अक्षरों वाला यह मंत्र 'ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धि विनाशय ह्लीं ॐ  स्वाहा' |
शत्रुओं का सर्वनाश कर अपने साधक को विजयश्री दिलाकर चिंता मुक्त कर देता है ! मंत्र का जप करते समय पवित्रता का विशेष ध्यान रखें, मंत्र पीले वस्त्र
पीले आसन और हल्दी की माला का ही प्रयोग करें जप करने से पहले बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करें |पं. जय गोविन्द शास्त्री

Friday, 17 April 2015

अक्षुण फलदाई स्वयंसिद्ध मुहूर्त 'अक्षय तृतीया' 21अप्रैल को
'न क्षयः इति अक्षयः' अर्थात - जिसका क्षय नहीं होता वह अक्षय है | सभी वैदिक ग्रंथों ने बैसाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया को 'अक्षय' तृतीया माना है |
मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार तिथियों का घटना-बढ़ना, क्षय होना, चान्द्रमास एवं सौरमास के अनुसार निश्चित रहता है, किन्तु 'अक्षय' तृतीया का कभी भी क्षय
नहीं होता ! श्रीश्वेत वाराहकल्प के वैवस्वत मन्वन्तर में सत्ययुग के आरम्भ की इस अक्षुण फलदाई तिथि को मानव कल्याण हेतु माता पार्वती ने बनाया था |
वे कहती हैं कि जो स्त्री/पुरुष सब प्रकार का सुख चाहतें हैं उन्हें 'अक्षय' तृतीया का व्रत करना चाहिए | इस तृतीया के व्रत के दिन नमक नहीं खाना चाहिए,
व्रत की महत्ता बताते हुए माँ पार्वती कहती हैं, कि यही व्रत करके मैं प्रत्येक जन्म में भगवान् शिव के साथ आनंदित  रहती हूँ ! उत्तम पति की प्राप्ति के
लिए भी हर कुँवारी कन्या को यह व्रत करना चाहिए ! जिनको संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो वे भी यह व्रत करके संतान सुख ले सकती हैं | देवी इंद्राणी ने
यही व्रत करके 'जयंत' नामक पुत्र प्राप्त किया था | देवी अरुंधती यही व्रत करके अपने पति महर्षि वशिष्ट के साथ आकाश में सबसे ऊपर का स्थान प्राप्त
कर सकीं थीं ! प्रजापति दक्ष की पुत्री रोहिणी ने यही व्रत करके अपने पति चन्द्र की सबसे प्रिय रहीं ! उन्होंने बिना नमक खाए यह व्रत किया था ! प्राणी को
इस दिन झूट बोलने और पाप कर्म करने से दूर  रहना चाहिए | जो प्राणी किसी भी तरह का यज्ञ, जप-तप, दान-पुण्य करता है उसके द्वारा किये गये सत्कर्म
का फल अक्षुण रहेगा | भूमिपूजन, व्यापार आरम्भ, गृहप्रवेश, वैवाहिक कार्य, यज्ञोपवीत संस्कार, नए अनुबंध, नामकरण आदि जैसे सभी मांगलिक कार्यों के लिए
अक्षय तृतीया वरदान की तरह है | इसदिन रोहिणी नक्षत्र का आरम्भ दोपहर 11 बजकर 57 मिनट पर हो रहा है उससमय अभिजित मुहूर्त भी रहेगा | इसलिए
रोहिणी नक्षत्र के संयोग से दिन और भी शुभ रहेगा | प्राणियों को इसदिन भगवान विष्णु की लक्ष्मी सहित गंध, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धुप, दीप नैवैद्य आदि से
पूजा करनी चाहिए ! अगर भगवान् विष्णु को गंगा जल और अक्षत से स्नान करावै, तो मनुष्य राजसूय यज्ञ के फल कि प्राप्ति होती है | शास्त्रों में इसदिन
वृक्षारोपण का भी अमोघ फल बताया गया है जिसप्रकार अक्षय तृतीया को लगाये गये वृक्ष हरे-भरे होकर पल्लवितपुष्पित होते हैं उसी प्रकार इसदिन वृक्षारोपण
करने वाला प्राणी भी कामयाबियों के चरम पर पहुंचता है ! पं जयगोविंद शास्त्री

Wednesday, 15 April 2015

हर इंसान के शरीर की अपनी एक गंध होती है | ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार यही अलग-अलग गंध अलग-अलग व्यक्तियों के व्यवहार
और भाग्य की सूचक भी होती है|